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गीता प्रेस, गोरखपुर >> आशा की नयी किरणें

आशा की नयी किरणें

रामचरण महेन्द्र

प्रकाशक : गीताप्रेस गोरखपुर प्रकाशित वर्ष : 2005
पृष्ठ :214
मुखपृष्ठ : पेपरबैक
पुस्तक क्रमांक : 1019
आईएसबीएन :81-293-0208-x

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प्रस्तुत है आशा की नयी किरणें...

आवश्यक-अनावश्यकका भेद करना सीखें


अनेक बार हमारी मानसिक शक्तियाँ धोखा दिया करती हैं। कठिन श्रमपूर्ण कार्योंके प्रति हमारा सम्मान नहीं होता। अरुचिकर कामोंको हाथमें लेनेको तबियत नहीं करती। सजे और ठोस कार्यसे बचनेके निमित्त प्रायः हम अनावश्यक कार्योंको हाथमें ले लेते हैं और उनमें ऐसे संलग्न हो जाते हैं, मानो अत्यन्त जरूरी काम कर रहे हों। कष्टसाध्य कार्योंसे भागनेकी और खेल-कूदमें प्रवृत्त रहनेकी वृत्ति बच्चोंमें विशेष रूपसे पायी जाती है। हममेंसे भी अनेक इसी वृत्तिके शिकार हैं। हम उन जरूरी कार्योंको न करेंगे, जिनमें श्रम लगता है। कहानी, उपन्यास पढ़नेवाले ढेरों है, पर गम्भीर साहित्यमें आनन्द लेनेवाले नगण्य हैं।

कठिन, अरुचिकर, परिश्रम और मनोयोग चाहनेवाले कार्योंको आप सबसे पहले करें। प्रातःकालका समय ऐसे कठोर कार्योंके लिये सुरक्षित रखिये। इसमें आप कठिन कार्योंको बखूबी कर सकते हैं; क्योंकि आपका मन और शरीर ताजा है।

कौन काम पहले, कौन बादमें करें इसका विवेक मनुष्यको अपनी उच्चतम शक्तियोंको एक स्थानपर केन्द्रित करना सिखाता है। अनावश्यक कार्य सरल होते हैं पर उनसे कोई स्थायी लाभ नहीं होता। ऐसे मोहक प्रलोभनसे सावधान!

सच्ची इच्छा और नकली इच्छामें विवेक करें

आप जीवनमें छोटी-बड़ी अनेकों इच्छाओंको पूर्ण करने तथा बड़े बननेके अनेकों स्वप्न देखा करते हैं। 'मैं यह भी कर लूँ, वह भी कर लूँ, 'लक्ष्मीकी मेरे पास कृपा हो', 'सरस्वती सहायक हो' ऐसी-ऐसी सैकड़ों इच्छाएँ सागरमें तरंगोंकी भांति मनमें उत्पन्न होती रहती हैं। ये थोथी बातें हैं। जो निरी कपोल-कल्पनामें निमग्न रहता है कार्य कुछ नहीं करता, वह निरा शेखचिल्ली ही कहा जायगा। ये सब नकली इच्छाएँ हैँ जिनका कुछ महत्त्व नहीं।

सच्ची इच्छा मनमें रखनेवाला अपने लक्ष्यके प्रति उत्साह, जागरूकता और परिश्रमसे युक्त रहता है। नकली इच्छा मेहनतका अवसर आते ही विलुप्त हो जाती है। असली इच्छा कठोर परिश्रम, कठिनाई, असफलता तथा कष्टोंके बावजूद स्थायी बनी रहती है। सच्ची इच्छामें स्थायी प्रयत्नकी भावना है। जिसके प्रति जितनी दृढ़ सच्ची इच्छा होती है, वह उतनी ही सफल होती है। नकली इच्छा आकस्मिक सक्रियता मात्र है, सच्ची इच्छा निरन्तर उत्साहपूर्ण सक्रियता है। नकली इच्छाको शक्तिका अपव्यय, आलस्य और व्यसन नष्ट-भ्रष्ट कर देते हैं, पर सच्ची इच्छाके सामने ये दुम दबाकर भाग जाते हैं।

शक्तिके अपव्यय (बिखरना) से बचकर कार्यको हाथमें लें, उसीमें गड़ जायँ, तभी आप सखी इच्छाकी साधना कर सकते हैं। सावधान! आलस्य एवं व्यसनको पास न फटकने दीजियेगा। मानव संस्कृतिने जितने महान् कार्य किये है; वे तीव्र स्थायी इच्छा-शक्तिके संतुलनद्वारा ही सम्पन्न हुए हैं। इच्छा-शक्ति ही आपको आगे प्रेरित करनेवाली अमोघ शक्ति है। निश्चयमें कभी ढीले न रहें।

समीपसे देखें

दूरकी दुनिया, व्यक्ति, मनुष्य, संस्थाएँ एक अभिनव आकर्षणसे युक्त प्रतीत होते हैं। वस्तुकी दूरी एक भीना धुँधलापन नेत्रोंपर बिछा देती है। इस अस्पष्टताके आवरणमें असुन्दर अकल्याणकारी भी सुन्दर और कल्याणकारी प्रतीत होने लगता है। दूरसे चित्रोंमें नया सौन्दर्य भर जाता है। समीपसे देखनेपर आप ऐसे अनेक रँगे सियारोंसे परिचित हो जायँगे, उनके अनेक रहस्य आपके सामने प्रकट होंगे, संस्थाओंकी कलई खुल जायगी, बड़े व्यक्तियोंकी पोले खुल जायँगी। आप देखेंगे कि जो दूरसे चमकता है, वह सब सोना नहीं होता। चाँदमें भी कालिमा लगी हुई है। समीपसे देखनेपर आपको बड़े व्यक्तियोंमें तुच्छता और तुच्छ समझे जानेवालोंमें त्याग और बलिदानकी महानता दृष्टिगोचर होगी।

अपनी गुप्त बातें हर-किसीसे न कहें

प्रत्येक व्यक्तिके पास कुछ ऐसी गुप्त बातें रहस्योंके रूपमें होती हैं, जिनकी गोपनीयतापर उसकी प्रतिष्ठा, साख या सामाजिक स्थिति निर्भर रहती है। अनेक बार ऐसी गुप्त व्यथाएँ होती हैं, जिन्हें दूसरे व्यक्ति बाँट नहीं सकते, केवल हँसी और व्यंग्य अवश्य कर सकते हैं। आपके कष्ट सुनकर उनकी दर्प-पूर्ति और ईर्ष्याकी वासनाएँ शान्त होती हैं। आपकी तकलीफोंको सुनकर वे अपने-आपकों उनसे ऊँचा समझते हैं। आपको हेय दृष्टिसे देखते हैं। मन-ही-मन आपकी मजबूरियों और असफलताओंपर हँसते हैं। जो बाहरसे सान्त्वना भी देते दिखायी देते हैं, उनके मनमें भी प्रायः अपनी दर्प-पूर्तिका भाव रहता है।

जिनकी आप सहानुभूति चाहते हैं, उनसे आपको कोई लाभ होने-जानेवाला नहीं है। जो सहानुभूति केवल मिथ्या प्रदर्शनके लिये है, उससे क्या लाभ? यही सहानुभूति प्रदर्शन करनेवाले दूसरोंके सम्मुख जाकर आपकी गुप्त बातें फैलायेंगे और आपकी अप्रतिष्ठाका कारण बनेंगे। आपके मित्र ही आपके गुप्त भेद चारों ओर फैलाकर किनारा कस लेंगे।

कविवर रहीमने इसी तत्त्वको स्पष्ट करते हुए लिखा है-

रहिमन निज मनकी व्यथा मन ही रखिये गोय।
सुनि अठिलैहैं लोग सब, बाँट न लैहै कोय।।

व्यापारियों, उच्च अधिकारियों तथा नेताओंके लिये अपने कार्यालय, व्यापार, दूकान, घर या पार्टीके भेदोंको गुप्त रखना आवश्यक है। गोपनीयतासे आपमें दूसरोंको आकर्षण प्रतीत हो जायगा।

सम्भव है, आपमें कुछ ऐसी गुप्त कमजोरियों हैं, जिनका दूसरोंको बताना आपके, आपके परिवार या अन्य व्यक्तियोंके लिये अहितकर हो। ऐसी दुर्बलताओंको दफना देनेमें ही लाभ है।

व्यापारमें अपने लाभ-हानि, वास्तविक आर्थिक स्थिति किसीसे कहना अत्यन्त हानिप्रद है। जबतक बाहरवाले यह समझते हैं कि आपकी आन्तरिक स्थिति अच्छी है, आप खूब लाभ कमा रहे हैं, आपके पास पूँजी एकत्रित है, तबतक आपकी साख बँधी रहती है, उधारसे भी आपके व्यापारमें सहायता मिलती है किंतु आपके घाटेकी बात सुनकर आपके निकट सम्बन्धी भी किनारा कसलेंगे, कोई तनिक भी सहायता प्रदान न करेगा। बनी-बनीके सब कोई साथी हैं, पर बिगड़ीका कोई नहीं है। सम्भव है, धीरे-धीरे आपकी हानि दूर होकर फिर अच्छे दिन फिरें, समयकी गतिके साथ आप पुनः समृद्धिशाली बन जायँ। अतः जिन मानसिक उलझनों, हानियों, कष्टोंमें आप हों, उन्हें पृथक्-पृथक् सुलझाकर स्वयं हल करें। अपने आत्मबल, गुप्त सामर्थ्यको उत्तेजित करें और स्वयं अपनी सहायता करें। दूसरोंसे अपने कष्टों एवं मजबूरियोंकी कहानियाँ न कहते फिरें।

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    अनुक्रम

  1. अपने-आपको हीन समझना एक भयंकर भूल
  2. दुर्बलता एक पाप है
  3. आप और आपका संसार
  4. अपने वास्तविक स्वरूपको समझिये
  5. तुम अकेले हो, पर शक्तिहीन नहीं!
  6. कथनी और करनी?
  7. शक्तिका हास क्यों होता है?
  8. उन्नतिमें बाधक कौन?
  9. अभावोंकी अद्भुत प्रतिक्रिया
  10. इसका क्या कारण है?
  11. अभावोंको चुनौती दीजिये
  12. आपके अभाव और अधूरापन
  13. आपकी संचित शक्तियां
  14. शक्तियोंका दुरुपयोग मत कीजिये
  15. महानताके बीज
  16. पुरुषार्थ कीजिये !
  17. आलस्य न करना ही अमृत पद है
  18. विषम परिस्थितियोंमें भी आगे बढ़िये
  19. प्रतिकूलतासे घबराइये नहीं !
  20. दूसरों का सहारा एक मृगतृष्णा
  21. क्या आत्मबलकी वृद्धि सम्मव है?
  22. मनकी दुर्बलता-कारण और निवारण
  23. गुप्त शक्तियोंको विकसित करनेके साधन
  24. हमें क्या इष्ट है ?
  25. बुद्धिका यथार्थ स्वरूप
  26. चित्तकी शाखा-प्रशाखाएँ
  27. पतञ्जलिके अनुसार चित्तवृत्तियाँ
  28. स्वाध्यायमें सहायक हमारी ग्राहक-शक्ति
  29. आपकी अद्भुत स्मरणशक्ति
  30. लक्ष्मीजी आती हैं
  31. लक्ष्मीजी कहां रहती हैं
  32. इन्द्रकृतं श्रीमहालक्ष्मष्टकं स्तोत्रम्
  33. लक्ष्मीजी कहां नहीं रहतीं
  34. लक्ष्मी के दुरुपयोग में दोष
  35. समृद्धि के पथपर
  36. आर्थिक सफलता के मानसिक संकेत
  37. 'किंतु' और 'परंतु'
  38. हिचकिचाहट
  39. निर्णय-शक्तिकी वृद्धिके उपाय
  40. आपके वशकी बात
  41. जीवन-पराग
  42. मध्य मार्ग ही श्रेष्ठतम
  43. सौन्दर्यकी शक्ति प्राप्त करें
  44. जीवनमें सौन्दर्यको प्रविष्ट कीजिये
  45. सफाई, सुव्यवस्था और सौन्दर्य
  46. आत्मग्लानि और उसे दूर करनेके उपाय
  47. जीवनकी कला
  48. जीवनमें रस लें
  49. बन्धनोंसे मुक्त समझें
  50. आवश्यक-अनावश्यकका भेद करना सीखें
  51. समृद्धि अथवा निर्धनताका मूल केन्द्र-हमारी आदतें!
  52. स्वभाव कैसे बदले?
  53. शक्तियोंको खोलनेका मार्ग
  54. बहम, शंका, संदेह
  55. संशय करनेवालेको सुख प्राप्त नहीं हो सकता
  56. मानव-जीवन कर्मक्षेत्र ही है
  57. सक्रिय जीवन व्यतीत कीजिये
  58. अक्षय यौवनका आनन्द लीजिये
  59. चलते रहो !
  60. व्यस्त रहा कीजिये
  61. छोटी-छोटी बातोंके लिये चिन्तित न रहें
  62. कल्पित भय व्यर्थ हैं
  63. अनिवारणीयसे संतुष्ट रहनेका प्रयत्न कीजिये
  64. मानसिक संतुलन धारण कीजिये
  65. दुर्भावना तथा सद्धावना
  66. मानसिक द्वन्द्वोंसे मुक्त रहिये
  67. प्रतिस्पर्धाकी भावनासे हानि
  68. जीवन की भूलें
  69. अपने-आपका स्वामी बनकर रहिये !
  70. ईश्वरीय शक्तिकी जड़ आपके अंदर है
  71. शक्तियोंका निरन्तर उपयोग कीजिये
  72. ग्रहण-शक्ति बढ़ाते चलिये
  73. शक्ति, सामर्थ्य और सफलता
  74. अमूल्य वचन

विनामूल्य पूर्वावलोकन

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